मंगलवार 13 अक्टूबर 2026 - 12:20
हज़रत फ़ातेमा ज़हेरा स.अ. कि जिंदगी इल्म, इबादत,इसार और विलायत की रक्षा का उज्ज्वल उदाहरण है।आयतुल्लाह अराफी

हौज़ा / ईरान के हौज़ा-ए-इल्मिया के प्रमुख आयतुल्लाह अली रज़ा अराफी ने हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के अय्याम-ए-शहादत के अवसर पर प्रचारकों से अपील की है कि वे इन दिनों का इस्तेमाल धार्मिक शिक्षाओं को आम करने, सामाजिक गतिविधियों में जनता की भागीदारी बढ़ाने और समाज के सामने मौजूद शैक्षिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक समस्याओं का जागरूकता के साथ मुकाबला करने के लिए करें।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , ईरान के हौज़ा-ए-इल्मिया के प्रमुख आयतुल्लाह अली रज़ा अराफी ने अय्याम-ए-फ़ातिमिया के अवसर पर अपने संदेश में ईरान की जनता, हौज़ा-ए-इल्मिया, उलमा, धार्मिक हस्तियों और प्रचारकों के प्रति संवेदना व्यक्त की।

उन्होंने घोषणा की कि क़ुम के धार्मिक शिक्षण केंद्रों में सतह और दर्स-ए-ख़ारिज की कक्षाएं तथा विशेषज्ञता केंद्रों की कक्षाएं 13 जमादिउल-अव्वल से सप्ताह के अंत तक बंद रहेंगा, ताकि छात्र और विद्वान विभिन्न क्षेत्रों में जाकर तब्लीगी गतिविधियों में हिस्सा ले सकें। प्रांतों और प्रारंभिक स्तर की कक्षाओं में छुट्टियों तथा प्रचार कार्यक्रमों की व्यवस्था की ज़िम्मेदारी संबंधित अधिकारियों को सौंपी गई है।

आयतुल्लाह अराफी ने कहा कि हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की शख्सियत को क़ुरआन, हदीस और इस्लामी इतिहास में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है। आपका जीवन इल्म, इबादत, ईसार और विलायत की रक्षा का उज्ज्वल उदाहरण है।

इसलिए उलमा, ख़तीबों, शिक्षकों और प्रचारकों की जिम्मेदारी है कि वे अय्याम-ए-फ़ातिमिया के दौरान आपकी इल्मी, इबादती, सामाजिक और राजनीतिक ज़िंदगी के विभिन्न पहलुओं को बयान करें और लोगों को आपकी सीरत से परिचित कराएं।

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि धार्मिक केंद्रों और मस्जिदों में मजलिसों तथा तब्लीगी कार्यक्रमों को प्रभावी बनाया जाए। प्रचारकों के समूह विभिन्न क्षेत्रों में जाएं और सामाजिक कार्यक्रमों में जनता की भागीदारी को बढ़ावा दें। उनके अनुसार, मौजूदा परिस्थितियों में धार्मिक शिक्षाओं को स्पष्ट रूप से समझाने और समाज में इस्लामी मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है।

ईरान के हौज़ा-ए-इल्मिया के प्रमुख ने कहा कि धार्मिक और क्रांतिकारी प्रशिक्षण तभी प्रभावी हो सकता है, जब लोगों की समस्याओं को हल करने, उनकी परेशानियों को कम करने और व्यावहारिक रूप से उनकी मदद करने पर भी ध्यान दिया जाए। उन्होंने जनसेवा के लिए निरंतर गतिविधियां शुरू करने और विशेष रूप से युवाओं की आवश्यकताओं पर ध्यान देने की ज़रूरत पर बल दिया।

उन्होंने अधिकारियों से देश के विकास के लिए अपने प्रयास बढ़ाने और जनता, विशेषकर आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे लोगों की समस्याओं को दूर करने के लिए प्रभावी कदम उठाने की मांग की। उनके अनुसार, जनता और जिम्मेदार अधिकारी आपसी सहयोग तथा प्रतिरोधी अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों पर अमल करके देश को मौजूदा संवेदनशील परिस्थितियों से बाहर निकाल सकते हैं।

आयतुल्लाह अराफी ने एकता, सामाजिक सद्भाव, धैर्य, दृढ़ता और रहबर-ए-इंक़िलाब के अनुसरण को ईरानी राष्ट्र की प्रमुख शक्तियां बताते हुए कहा कि इन मूल्यों को मज़बूत बनाने के लिए प्रचार, शिक्षा और प्रशिक्षण के सभी अवसरों का लाभ उठाया जाना चाहिए। उन्होंने प्रचारकों से आग्रह किया कि वे लोगों में कठिनाइयों का सामना करने की क्षमता विकसित करें और परिस्थितियों को समझकर सही निर्णय लेने के प्रति जागरूकता पैदा करें।

सांस्कृतिक और सामाजिक समस्याओं का उल्लेख करते हुए आयतुल्लाह अराफी ने कहा कि परिवार, स्वस्थ समाज तथा हिजाब और इफ़्फ़त (पवित्रता) जैसी इस्लामी मान्यताओं के सामने मौजूद चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए हज़रत फ़ातिमा ज़हेरा सलामुल्लाह अलैहा के जीवन को आदर्श के रूप में पेश करना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि इस संबंध में महिलाओं, लड़कियों, उलमा और प्रचारकों को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए। जनसंचार माध्यमों, सोशल मीडिया, धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों और प्रशिक्षण गतिविधियों के माध्यम से नैतिक तथा सामाजिक समस्याओं के प्रति जागरूकता पैदा की जानी चाहिए। साथ ही, संबंधित संस्थाओं से इन समस्याओं के समाधान के लिए आवश्यक कदम उठाने की मांग की जानी चाहिए।

अपने संदेश के अंत में आयतुल्लाह अराफी ने ईरानी राष्ट्र, उम्मत ए इस्लामिया, उलेमा, रहबर-ए-इंक़िलाब आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा ख़ामेनेई और सशस्त्र बलों की सुरक्षा, सम्मान तथा सफलता के लिए दुआ की। उन्होंने आशा व्यक्त की कि अय्याम-ए-फ़ातिमिया के दौरान अज़ादारी और धार्मिक सेवाओं में लगे लोगों के प्रयास बारगाह-ए-इलाही में स्वीकार किए जाएंगे।

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